1. “क्रोध-वाच्यावाच्यं प्रकुपितो न विजानाति कर्हिचित्।
नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नवाच्यं विद्यते क्वचित्॥”
अर्थात-“क्रोध की दशा में मनुष्य को कहने और न कहने योग्य बातों का विवेक नहीं रहता। क्रुद्ध मनुष्य कुछ भी कह सकता है। उसके लिए कुछ भी अकार्य और अवाच्य नहीं है।”
1. उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्। सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चदपि दुर्लभम्॥ किष्किंधा काण्ड, प्रथम सर्ग, श्लोक 23
अर्थ – उत्साह बड़ा बलवान होता है; उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
2. निरुत्साहस्य दीनस्य शोकपर्याकुलात्मनः। सर्वार्था व्यवसीदन्ति व्यसनं चाधिगच्छति॥
युद्धकाण्ड, सर्ग 2, श्लोक 6
अर्थ – उत्साहहीन, दीन और शोकाकुल मनुष्य के सभी काम बिगड़ जाते हैं, वह घोर विपत्ति में फंस जाता है। इसलिए सदैव उत्साह के साथ काम करने का प्रयास करना चाहिए।
3. सुलभा: पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः।।
-युद्धकाण्ड, सर्ग 12, श्लोक 13
अर्थ- हे राजन! सदा चिकनी-चुपड़ी बातें कहने वाले मनुष्य तो बहुत मिलते हैं, परन्तु अप्रिय हितकारी एवं न्याययुक्त बात कहने और सुननेवाले मनुष्य बिरले ही होते हैं। अर्थात कम मिलते हैं।
4. एष दोषो माहनत्र प्रपन्नामरक्षणे।
अस्वर्ग्यं चायशस्यं च बलवीर्यविनाशनम्।।
युद्धकाण्ड, सर्ग 14, श्लोक 13
अर्थ- शरण में आये हुए की रक्षा न करने में महान दोष है। शरणागत की रक्षा न करना दुःखों का मूल है, अपयश का कारण है और शक्ति तथा पराक्रम का नाशक है।
5. गुणवान् व परजनः स्वजनो निर्गुणोऽपि वा। निर्गुणः स्वजनः श्रेयान् यः परः पर एव सः॥
अर्थ – पराया मनुष्य भले ही गुणवान हो तथा स्वजन गुणहीन हो, लेकिन गुणवान परायों से गुणहीन स्वजन ही भले होते हैं।
5. . वसेत्सह सपत्नेन क्रुद्धेनाशुविषेण च।
न तू मित्रप्रवादेन संवसेच्छत्रु सेविना॥
अर्थ – शत्रु और सर्प के साथ भले ही रह लें, लेकिन ऐसे मनुष्य के साथ न रहें, जो ऊपर से तो मित्र और भीतर से शत्रु का हित साधक हो।
6. न सुहृद्यो विपन्नार्था दिनमभ्युपपद्यते।
स बन्धुर्योअपनीतेषु सहाय्यायोपकल्पते॥
अर्थ – अच्छा मित्र वही है जो विपत्ति से घिरे मित्र का साथ दे और सच्चा बन्धु वही है जो अपने कुमार्गगामी बन्धु (बुरे रास्ते पर चलने वाले भाई) की भी सहायता करे।
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