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Author: अपाला

  • संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 8 Class 8 Sanskrit Chitra Varnan

    संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 8 के छात्रों के लिए एक महत्त्वपूर्ण विषय है। कक्षा 6 एवं 7 में संस्कृत चित्र-वर्णन में वाक्य निर्माण नहीं करना होता है। चित्र के साथ मञ्जूषा तथा कुछ अधूरे वाक्य दिए जाते हैं। मञ्जूषा में दिए गये पदों से वाक्य का खाली स्थान भरा जाता है। अर्थात् छात्रों को पूरा वाक्य निर्माण न करके केवल रिक्त स्थानों की पूर्ति करनी होती है। कक्षा 8 में छात्रों को चित्र देखकर मञ्जूषा (Box or bracket)में से पद चुनकर स्वयं ही वाक्य-निर्माण करना पड़ता है। इस प्रकार संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 8 में थोडा कठिन हो जाता है।

    संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 8 के कुछ नियम एवं निर्देश (Rules of Sanskrit Chitra Varnan Class 8)

    छात्र अक्सर वाक्य-निर्माण की बात से परेशान हो जाते हैं। कुछ छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दें और आसान से नियमों का पालन करें। संस्कृत चित्र-वर्णन कठिन नहीं लगेगा-

    नियम

    1. संस्कृत चित्र-वर्णन का पहला नियम है लट् लकार का प्रयोग। आपको चित्र देखकर उसका वर्णन करना होता है, जो वर्तमान काल में होता है। इसलिए लट् लकार की क्रिया का प्रयोग करना चाहिए। क्रियापद प्रायः मञ्जूषा में दिये होते हैं। आपको बस उन्हें पहचानना होता है। यदि क्रिया पद न दिए हों, तो कर्ता के वचन के अनुसार क्रिया पद बना लीजिए।
    2. दूसरा नियम है प्रथम पुरुष के कर्ता का प्रयोग। आपको पता है कि संस्कृत में प्रथम पुरुष का कर्ता वह होता है, जिसके बारे में बात की जा रही हो। चित्र-वर्णन में भी आप किसी का वर्णन कर रहे होते हैं। इसलिए प्रथम पुरुष का कर्ता और उसके अनुसार प्रथम पुरुष की क्रिया का प्रयोग होता है।
    3. तीसरा नियम वाक्य-निर्माण का नियम है। वाक्य बनाते समय कर्ता-क्रिया सम्बन्ध का ध्यान रखना चाहिए। जिस पुरुष और वचन में कर्ता होता है, उसी पुरुष वचन में क्रिया भी होनी चाहिए। संस्कृत चित्र-वर्णन में प्रथम पुरुष के कर्ता का प्रयोग होता है, इसलिए क्रिया भी प्रथम पुरुष में ही होगी। आपको है वचन पर अधिक ध्यान देना है। संस्कृत में तीन वचन होते हैं, तोकर्ता के एकवचन, द्विवचन या बहुवचन के अनुसार क्रिया भी होगी।

    ध्यान देने योग्य अन्य बातें

    1. कुछ ध्यान देने योग्य बातें हैं, उनमें से पहली है- मञ्जूषा के शब्दों का अधिक से अधिक प्रयोग। यद्यपि आप कुछ क्रिया पद स्वयं भी बना सकते हैं, तथापि आपसे अपेक्षा की जाती है कि मञ्जूषा के शब्दों का पूरा प्रयोग करें।
    2. इस बात का ध्यान रखें कि मञ्जूषा में अक्सर विशेषण तथा अन्य विभक्तियों के पद भी दिये होते हैं। आपको यह देखना होगा कि कौन सा विशेषण किस विशेष्य के साथ सटीक बैठता है। उदाहरण के लिए यदि किसी चित्र में कमल के फूल और पेड़ आदि दिये गये हैं। मञ्जूषा में ‘सुन्दराणि’ और विशालाः’ विशेषण दिये गये हैं। यहाँ आपको समझ जाना चाहिए कि ‘सुन्दराणि’ विशेषण कमलानि के साथ और ‘विशालाः’ विशेषण वृक्षाः पद के साथ लगेगा।
    3. संस्कृत चित्र-वर्णन में कुछ वाक्य पहले से तैयार करके उनमें कुछ शब्द डालकर नया वाक्य बनाया जा सकता है। जैसे यदि किसी विद्यालय का चित्र हो, तो पहला वाक्य होगा- “एतत्/इदम् विद्यालयस्य चित्रम् अस्ति।” यदि उद्यान का चित्र हो, तो बस विद्यालय के स्थान पर उद्यान शब्द की षष्ठी विभक्ति का प्रयोग कर देंगे।

    संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 8 उदाहरण 1. विद्यालय का चित्र (Sanskrit Chitra Varnan Class 8 with Answers)

    कक्षा 8 संस्कृत चित्र वर्णन अभ्यास के लिए विद्यालय का चित्र

    (विद्यालयस्य, छात्राः, शिक्षिका, क्रीडाक्षेत्रे, कन्दुकेन, पठन्ति, खेलन्ति, वृक्षाः)

    वाक्य-निर्माण

    1. एतत् विद्यालयस्य चित्रम् अस्ति।
    (यह विद्यालय का चित्र है।)

    2. विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति।
    (विद्यालय के चारों ओर पेड़ हैं। )

    3. चित्रे अनेके छात्राः सन्ति।
    (चित्र में अनेक छात्र हैं।)

    4. केचित् छात्राः क्रीडाक्षेत्रे कन्दुकेन क्रीडन्ति ।
    (कुछ छात्र खेल के मैदान में गेंद से खेल रहे हैं।)

    5. कक्षायां शिक्षिका छात्रान् पाठयति।
    (कक्षा में शिक्षिका छात्रों को पढ़ा रही है। )

    संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 8 उदाहरण 2 उद्यान का चित्र (Sanskrit Chitra Varnan Class 8 with Answers)

    संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 8 बगीचे का चित्र

    (चित्रम् (चित्र), उद्यानस्य (बगीचे का), बालकाः (बच्चे), क्रीडतः (खेल रहे हैं), कन्दुकेन (गेंद से), पठति (पढ़ रहा है), दोलायाम् (झूले पर), रचयति (बना रहा/रही है), खगाः (पक्षी),वृक्षाः (पेड़))

    वाक्य-निर्माण

    1. एतत् एकस्य उद्यानस्य चित्रम् अस्ति।
    (यह एक बगीचे का चित्र है।)

    2. उद्याने अनेके वृक्षाः सन्ति।
    (उद्यान में अनेक पेड़ हैं।)

    3. द्वौ बालकौ कन्दुकेन क्रीडतः।
    (दो लड़के गेंद से खेल रहे हैं)

    4. एका बालिका दोलायाम् उपविशति अपरा च बालिका चित्रं रचयति।
    (एक लड़की झूले पर बैठी है और दूसरी लड़की चित्र बना रही है।)

    5. एकः बालकः पुस्तकं पठति।
    (एक लड़का पुस्तक पढ़ रहा है।)

    संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 8 उदाहरण 3. तालाब का चित्र (Sanskrit Chitra Varnan Class 8 with Answers)

    कक्षा 8 संस्कृत चित्र वर्णन तालाब का चित्र

    (तडागस्य (तालाब का), कमलानि (कमल के फूल), विकसन्ति (खिल रहे हैं), वर्तिके (दो बतखें), तरतः (तैर रहे हैं), वृक्षाः (पेड़), खगाः (पक्षी), तीरे (किनारे), मेघाः (बादल), उत्पतन्ति (उड़ रहे हैं)। )

    वाक्य- निर्माण

    इदम् एकस्य तडागस्य चित्रम् अस्ति।
    (यह एक तालाब का चित्र है।)

    तडागस्य तीरे वृक्षाः सन्ति।
    (तालाब के किनारे पेड़ हैं। )

    तडागे द्वे वर्तिके तरतः।
    (तालाब में दो बतखें तैर रही हैं।

    अनेकानि कमलानि विकसन्ति।
    (अनेक कमल खिल रहे हैं।)

    आकाशे मेघाः सन्ति खगाः च उत्पतन्ति।
    (आकाश में बादल हैं और पक्षी उड़ रहे हैं।)

    संस्कृत चित्र वर्णन कक्षा 6 और 7 के लिए यहाँ क्लिक करें

  • संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 6 एवं 7

    संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 6 एवं 7 के पाठ्यक्रम का एक अभिन्न भाग है। इसमें एक सरल चित्र देकर उसके विषय में संस्कृत भाषा में तीन से पाँच वाक्य लिखने के लिए कहा जाता है। इसके लिए एक मञ्जूषा में कुछ पद दिए जाते हैं, जिनमें से पद लेकर वाक्य बनाया जाता है। कुछ विद्यालयों में परीक्षा वाक्य लिखकर उसमें खाली स्थान दिया जाता है, जिन्हें मञ्जूषा से पद छाँटकर पूरा करना होता है।

    चित्र-वर्णन में वाक्य बनाते समय कुछ बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

    1. सबसे पहले चित्र को ध्यान से देखें कि वह किससे सम्बन्धित है।
    2. पहले वाक्य में चित्र किस बारे में यह बताएँ। इसके लिए “एतत्/इदम् (शब्द + षष्ठी विभक्ति) अस्ति” इस वाक्य का प्रयोग करें।
    3. मञ्जूषा में सबसे पहले क्रियाएँ ढूंढे, फिर देखें कि वह क्रिया किस कर्ता के साथ सटीक बैठती है। ध्यान रखें कि जिस पुरुष और वचन में क्रिया होगी, उसी पुरुष और वचन में कर्ता भी होना चाहिए।
    4. वाक्य सरल और छोटे रखें। बड़े वाक्य बनाने से बचें।
    5. प्रयास करें कि वाक्यों में मञ्जूषा में दिए गए पदों का प्रयोग हो।

    नीचे संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 6 एवं 7 के दो अभ्यास हिन्दी अनुवाद के साथ दिए गए हैं। छात्र इसे देखकर अभ्यास कर सकते हैं।

    संस्कृत चित्र-वर्णन कक्षा 6-7

    • चित्र-वर्णन

    (चित्रं दृष्ट्वा कोष्ठके प्रदत्तपदैः वाक्यानि पूरयत)

    (चित्रम्, उद्यानम्, पठन्ति, वृक्षाः, पुष्पाणि, बालिका )

    (क) एतत् विद्यालयस्य ____ अस्ति। (यह विद्यालय का चित्र है।)

    (ख) बालकः ____ बालिका च विद्यालयं गच्छतः। (लड़के-लडकियाँ विद्यालय जा रहे हैं।)

    (ग) विद्यालये छात्राः ____। (विद्यालय में अनेक छात्र पढ़ते हैं।)

    (घ) विद्यालयस्य पुरतः _____ अस्ति। (विद्यालय के सामने उद्यान है।)

    (ङ)उद्याने _____ ______ च सन्ति। (उद्यान में अनेक पेड़ और बहुत से फूल हैं।)

    उत्तराणि- (क) चित्रम्, (ख) बालिका, (ग) पठन्ति, (घ) उद्यानम्, (ङ) वृक्षाः पुष्पाणि

    (2) चित्र-वर्णन

    (चित्रं दृष्ट्वा कोष्ठके प्रदत्तपदैः वाक्यानि पूरयत)

    संस्कृत चित्रवर्णन

    (नौका, वृक्षाः, नदी, खगाः, मेघाः)

    क- एका _ _ _ वहति। (एक नदी बह रही है।)

    ख- चित्रे एका _ _ _ तरति। (चित्र में एक नाव तैर रही है।)

    ग- चित्रे बहवः _ _ _ सन्ति। (चित्र में बहुत से पेड़ हैं।)

    घ- आकाशे _ _ _ सन्ति। (आकाश में बहुत से बादल हैं।)

    ङ_ _ _ उत्पतन्ति। (बहुत से पक्षी उड़ रहे हैं।)

    उत्तराणि- क- नदी, ख- नौका, ग- वृक्षाः, घ- मेघाः, ङ- उत्पतन्ति

  • रामायणस्य प्रमुखा: श्लोकाः

    1. “क्रोध-वाच्यावाच्यं प्रकुपितो न विजानाति कर्हिचित्।
    नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नवाच्यं विद्यते क्वचित्॥”

    अर्थात-“क्रोध की दशा में मनुष्य को कहने और न कहने योग्य बातों का विवेक नहीं रहता। क्रुद्ध मनुष्य कुछ भी कह सकता है। उसके लिए कुछ भी अकार्य और अवाच्य नहीं है।”

    1. उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्। सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चदपि दुर्लभम्॥ किष्किंधा काण्ड, प्रथम सर्ग, श्लोक 23

    अर्थ – उत्साह बड़ा बलवान होता है; उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

    2. निरुत्साहस्य दीनस्य शोकपर्याकुलात्मनः। सर्वार्था व्यवसीदन्ति व्यसनं चाधिगच्छति॥ 
    युद्धकाण्ड, सर्ग 2, श्लोक 6

    अर्थ – उत्साहहीन, दीन और शोकाकुल मनुष्य के सभी काम बिगड़ जाते हैं, वह घोर विपत्ति में फंस जाता है। इसलिए सदैव उत्साह के साथ काम करने का प्रयास करना चाहिए। 

    3. सुलभा: पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।
    अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः।।
    -युद्धकाण्ड, सर्ग 12, श्लोक 13

    अर्थ- हे राजन! सदा चिकनी-चुपड़ी बातें कहने वाले मनुष्य तो बहुत मिलते हैं, परन्तु अप्रिय हितकारी एवं न्याययुक्त बात कहने और सुननेवाले मनुष्य बिरले ही होते हैं। अर्थात कम मिलते हैं।

    4. एष दोषो माहनत्र प्रपन्नामरक्षणे।
    अस्वर्ग्यं चायशस्यं च बलवीर्यविनाशनम्।।
    युद्धकाण्ड, सर्ग 14, श्लोक 13

    अर्थ- शरण में आये हुए की रक्षा न करने में महान दोष है। शरणागत की रक्षा न करना दुःखों का मूल है, अपयश का कारण है और शक्ति तथा पराक्रम का नाशक है।

    5. गुणवान् व परजनः स्वजनो निर्गुणोऽपि वा। निर्गुणः स्वजनः श्रेयान् यः परः पर एव सः॥ 

    अर्थ – पराया मनुष्य भले ही गुणवान हो तथा स्वजन गुणहीन हो, लेकिन गुणवान परायों से गुणहीन स्वजन ही भले होते हैं।

    5. . वसेत्सह सपत्नेन क्रुद्धेनाशुविषेण च। 
         न तू मित्रप्रवादेन संवसेच्छत्रु सेविना॥ 

    अर्थ – शत्रु और सर्प के साथ भले ही रह लें, लेकिन ऐसे मनुष्य के साथ न रहें, जो ऊपर से तो मित्र और भीतर से शत्रु का हित साधक हो। 

    6. न सुहृद्यो विपन्नार्था दिनमभ्युपपद्यते।

        स बन्धुर्योअपनीतेषु सहाय्यायोपकल्पते॥ 
    अर्थ – अच्छा मित्र वही है जो विपत्ति से घिरे मित्र का साथ दे और सच्चा बन्धु वही है जो अपने कुमार्गगामी बन्धु (बुरे रास्ते पर चलने वाले भाई) की भी सहायता करे।