समानता के मन्त्र : समानता और सहयोग के महत्त्व को दर्शाने वाले वैदिक मन्त्र

वैदिक साहित्य में केवल संहिताएँ अर्थात् ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद सम्मिलित नहीं हैं। इसके अंतर्गत ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् भी आते हैं। इन सभी ग्रंथों में उल्लिखित मन्त्रों को वैदिक मन्त्र कहा जाता है। समानता के मन्त्र से तात्पर्य उन सभी मन्त्रों से है, जिनमें समानता (Equality), सामाजिक समरसता, सहयोग और बंधुत्व (Brotherhood) को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया है। ऋग्वेद और अथर्ववेद के कई मंत्र स्पष्ट रूप से संदेश देते हैं कि सभी मनुष्य समान हैं। किसी में जन्म या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है, और सभी को मिलकर उन्नति करनी चाहिए।

समानता के मन्त्र Vadic Mantras Related to Equality, Fraternity and Collective Consciousness Sanskrit Solutions

समानता के विविध मंत्र

प्रस्तुत लेख में वेदों में वर्णित समानता के मन्त्र उनके हिंदी अर्थ के साथ दिए गए हैं:

भेदभाव का अंत

यह मन्त्र आपसी भेदभाव मिटाने की बात करता है।

“अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय”। (ऋग्वेद 5.60.5)

अर्थ- इन मनुष्यों में न कोई बड़ा (ज्येष्ठ) है और न कोई छोटा (कनिष्ठ) है। ये सभी आपस में भाई-भाई हैं, जो सौभाग्य और उन्नति प्राप्त करने के लिए एक साथ मिलकर प्रयास करते हैं। [1]

संगठन सूक्त मंत्र

यह मंत्र पूरी दुनिया को एकता, संगठन, आपसी प्रेम और सामूहिक प्रगति का संदेश देता है।

“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते”॥ (ऋग्वेद 10.191.2)

अर्थ –
संगच्छध्वं : हम सब (एक साथ मिलकर) साथ-साथ चलें।
संवदध्वं : हम सब एक साथ बोलें (यानी हमारे विचारों और वाणी में एकता हो)।
सं वो मनांसि जानताम् : हमारे मन और बुद्धि एक समान होकर ज्ञान प्राप्त करें।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते : प्राचीन काल में देवता आपस में बिना किसी भेदभाव के एकमत होकर यज्ञ का अपना-अपना भाग ग्रहण करते थे। वैसे ही हम मनुष्य भी आपस में मिलजुलकर रहें और समाज की उन्नति करें।

समान अधिकार और सामूहिक प्रगति

ऋग्वेद के अंतिम सूक्त (संगठन सूक्त) का यह मंत्र विचार, संकल्प और अधिकारों की समानता पर बल देता है। इस प्रकार के विचार एक समाज की प्रगति के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

“समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति”॥ (ऋग्वेद 10.191.4)

अर्थ – तुम्हारा संकल्प एक समान हो। तुम्हारे हृदय (भावनाएं) एक समान हों। तुम्हारा मन एक समान हो, जिससे तुम सबमें उत्तम एकता और सामंजस्य स्थापित हो सके।

सामाजिक समरसता और एक साथ भोजन

यह मंत्र समाज में बिना किसी भेदभाव के एक साथ रहने की बात करता है। यह समान रूप से संसाधनों का उपयोग करने और मिलकर भोजन करने का संदेश देता है।

“समानी प्रपा सह वोऽन्नभागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि।
सम्यञ्चोऽग्निं सपर्यत आरा इव नाभिम् अभितः”॥ (अथर्ववेद 3.30.6)

अर्थ – तुम्हारा पीने का पानी एक समान हो (सब एक ही घाट पर पानी पिएँ)। तुम्हारा अन्न का भाग भी समान हो। मैं तुम सबको एक ही बंधन (समानता) में बांधता हूँ। जिस प्रकार रथ के पहिये के आरे केंद्र (नाभि) से जुड़े रहते हैं, उसी प्रकार तुम सब भी मिलकर एक साथ ईश्वर की आराधना करो।

एक समान वैचारिक मंच

इस मंत्र में समाज के सभी वर्गों के लिए एक समान सभा, समान अधिकार और एक जैसे विचारों की कामना की गई है।

“समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्”। (ऋग्वेद 10.191.3)

अर्थ – इन सब लोगों के विचार एक समान हों। इनकी सभा (संसद/मंच) सबके लिए समान हो। इनका मन एक जैसा हो और इनका अंतःकरण (चित्त) भी एकता के भाव से युक्त हो।

द्वेषहीन समाज की परिकल्पना

यह मंत्र समाज से ईर्ष्या और द्वेष को समाप्त करने की बात करता है। साथ ही सबको माता-पिता और भाई-बहनों की तरह प्रेमपूर्वक रहने की सीख देता है।

“सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः।
भ्राता भ्रातरं मा द्विक्षद् स्वसा स्वसारमुत”॥ (अथर्ववेद 3.30.1)

अर्थ – मैं तुम सबको समान हृदय वाला, समान मन वाला और द्वेष रहित बनाता हूँ। भाई अपने भाई से द्वेष न करें। बहन अपनी बहन से कभी ईर्ष्या न करे। सभी प्रेमपूर्वक मिलकर रहें।

खुले विचार (उदारता) और वैश्विक कल्याण

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का यह मंत्र (1.89.1) सभी दिशाओं से कल्याणकारी और अजेय विचारों का स्वागत करने की प्रेरणा देता है। यह हमें प्रगति के लिए प्रेरित करते हैं। यह दिव्य शक्तियों से ज्ञानवर्धन और निरंतर सुरक्षा की कामना करता है। यह हमें उदारता और खुले विचारों के साथ रहने का संदेश देता है।

यह मंत्र ऋग्वेद के पहले मंडल के 89वें सूक्त का पहला मंत्र (1.89.1) है। इसे वैदिक वास्तुकला, दर्शन और दैनिक प्रार्थनाओं में सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त है। इसका कारण है कि यह मनुष्य को संकीर्ण (छोटी) सोच से ऊपर उठकर खुले विचारों और वैश्विक कल्याण (Global Well-being) की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।

“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरितासउद्भिदः।
देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे”॥( ऋग्वेद1.89.1)

अर्थ –

  • आ यन्तु – आएं या प्रवेश करें।
  • नः – हमारे पास / हमारे मन में।
  • भद्राः – कल्याणकारी, शुभ और श्रेष्ठ।
  • क्रतवो – विचार, संकल्प या ज्ञान।
  • विश्वतः – चारों दिशाओं से / संपूर्ण ब्रह्मांड से।
  • अदब्धासो – जो किसी से दबाए न जा सकें (अजेय) / सत्य से पूर्ण।
  • अपरितास – जिन्हें कोई रोक न सके / जो बाधाओं से रहित हों।
  • उद्भिदः – जो अज्ञान के आवरण को भेदकर प्रकट होने वाले हों / उन्नति देने वाले।
  • देवाः – दिव्य शक्तियां / देवगण।
  • यथा – जिससे कि।
  • सदम् इत् – सदैव ही / हमेशा।
  • वृधे – हमारी प्रगति और आत्मिक वृद्धि के लिए।
  • असन् – रहें।
  • अप्रायुवो – प्रमाद (आलस्य) रहित / निरंतर सतर्क।
  • रक्षितारो – रक्षक बनकर।
  • दिवे दिवे – दिन-प्रतिदिन / हर रोज।

उपर्युक्त मन्त्र भारतीय ज्ञान परम्परा में विचारों की उदारता की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि वैदिक ज्ञान कितना विशाल, गहन और विस्तृत था।

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