प्रिय विद्यार्थियों! कक्षा 9 और 10 की संस्कृत विषय की परीक्षाओं में संस्कृत समास (Sanskrit Samas) व्याकरण का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अंक दिलाने वाला विषय है। कई बार छात्रों को यह थोड़ा कठिन लगता है, लेकिन अगर इसे सही तरीके से समझा जाए, तो यह बेहद आसान और स्कोरिंग बन जाता है। आज के इस ब्लॉग में हम समास, उसके नियम और सभी भेदों को उदाहरण के साथ समझेंगे। यहाँ हिंदी भाषा के साथ अग्रेजी में भी संस्कृत समास को समझने का प्रयास किया जाएगा।
संस्कृत समास क्या है? (What is Samas?)
संस्कृत व्याकरण में दो या दो से अधिक पदों (शब्दों) के मेल से जब एक नया संक्षिप्त शब्द बनता है, तो उस प्रक्रिया को संस्कृत समास कहते हैं। समास का शाब्दिक अर्थ ही होता है—’संक्षेप’ (छोटा करना)। जब पदों को आपस में मिलाया जाता है, तो उनके बीच की विभक्तियाँ (द्वितीया विभक्ति, तृतीया विभक्ति) एवं योजक शब्द (च, इव आदि) लुप्त हो जाते हैं।
समस्त पद – समास होने के बाद जो नया शब्द बनता है, उसे ‘समस्त पद’ या ‘सामासिक पद’ कहते हैं।
समास विग्रह – सामासिक पद को वापस उसके पुराने रूप में तोड़कर लिखने की प्रक्रिया को ‘समास विग्रह’ कहते हैं।
उदाहरण
राज्ञः पुरुषः (राजा का पुरुष) समास होने पर बनेगा = राजपुरुषः
गंगायाः जलम (गंगा का जल) समास होने पर बनेगा = गंगाजलम्
In Sanskrit grammar, the process of combining two or more words (called Padas) to form a single, shortened word is known as Samas in Sanskrit (Compound). The literal meaning of Samas in Sanskrit is ‘abridgement’ or ‘condensation’. When words are joined together to form a compound, their internal case-endings (Vibhaktis) are dropped. The newly formed single word is called the Samast Pada (Compound word), and the process of breaking this compound word back into its original component words with their proper meanings is called Samas Vigrah (Dissolution of the compound). For example, combining Ragnah (of the king) and Purushah (man) gives the compound word Rajpurushah (king’s man).
कक्षा 9 और 10 के लिए निर्धारित नवीन संस्कृत समास पाठ्यक्रम (Sanskrit Samas Syllabus)
बोर्ड परीक्षाओं (जैसे CBSE) में अंकों के विभाजन और नए पाठ्यक्रम (New NCERT ‘शारदा’ एवं ‘शेमुषी’ पैटर्न) के अनुसार कक्षा 9 और 10 में निम्नलिखित समास शामिल किए गए हैं
कक्षा 9 का संस्कृत समास पाठ्यक्रम (Class 9 Sanskrit Samas Syllabus)
कक्षा 9 के विद्यार्थियों को केवल बुनियादी और सीमित समासों का अध्ययन करना होता है, जो कि निम्नलिखित हैं-
तत्पुरुष समास (Tatpurusha Samas):
इसके अंतर्गत मुख्य रूप से निम्नलिखित उपभेदों को ही पूछा जाता है
विभक्ति तत्पुरुष: द्वितीया से लेकर सप्तमी विभक्ति तक का लोप।
नञ् तत्पुरुष (Nañ Tatpurusha): नकारात्मक अर्थ वाले शब्द (जैसे- न उचितम् = अनुचितम्)।
उपपद तत्पुरुष (Upapada Tatpurusha): जहाँ समस्त पद का उत्तर पद एक क्रियामूलक शब्द होता है और विग्रह करने पर तिङन्त पद में होती है (जैसे- कुम्भं करोति इति = कुम्भकारः)।
कर्मधारय समास (Karmadharaya Samas)
कक्षा 10 का संस्कृत समास पाठ्यक्रम (Class 10 Sanskrit Samas Syllabus)
कक्षा 10 के बोर्ड पाठ्यक्रम में व्याकरण का दायरा बढ़ जाता है, जहाँ छात्रों से वाक्य संदर्भ में मुख्य रूप से निम्नलिखित 4 प्रकार के समासों की पहचान और विग्रह करने की अपेक्षा की जाती है-
तत्पुरुष समास (Tatpurusha Samas):
विभक्ति तत्पुरुष (द्वितीया से सप्तमी विभक्ति तक का लोप)।
अव्ययीभाव समास (Avyayibhava Samas)
इसके अंतर्गत केवल 6 प्रमुख अव्यय/उपसर्गों से बनने वाले पद ही पाठ्यक्रम में शामिल हैं:
अनु (पश्चात् / योग्यम् के अर्थ में)
उप (समीपम् के अर्थ में)
निर् / निर (अभावः के अर्थ में)
यथा (अनतिक्रम्य के अर्थ में)
प्रति (आवृत्ति / वीप्सा के अर्थ में)
स (सहितम् के अर्थ में) [1]
द्वंद्व समास (Dvandva Samas)
मुख्य रूप से इतरेतर द्वंद्व (जैसे- रामलक्ष्मणौ) और अंगों/समूहों का बोध कराने वाला समाहार द्वंद्व।
बहुव्रीहि समास (Bahuvrihi Samas)
अन्य पद की प्रधानता दर्शाने वाले रूढ़ शब्द (जैसे- पीताम्बरः, दशाननः)।
संस्कृत समास के मुख्य भेद (Types of Samas)
संस्कृत व्याकरण के अनुसार समास के मुख्य रूप से चार भेद होते हैं। द्विगु और कर्मधारय वस्तुतः तत्पुरुष समास के ही भेद हैं। परन्तु छात्रों की आसानी के लिए यहाँ हम यह मानकर चलेंगे कि सामान्यतः संस्कृत समास के छह (6) भेद हैं। कक्षा 9 और 10 के पाठ्यक्रम में इन सभी भेदों का बहुत महत्व है:
1. अव्ययीभाव समास (Avyayibhava Samas (avyayībhāva))
इस समास में पहला पद अव्यय (जिसका रूप नहीं बदलता) या उपसर्ग होता है, और वही पद प्रधान (मुख्य) होता है। समास होने के बाद पूरा शब्द अव्यय बन जाता है और हमेशा नपुंसकलिंग एकवचन में प्रयुक्त होता है।
पहचान – शब्द के शुरू में अनु, उप, यथा, प्रति, निर्, स आदि जुड़े होते हैं।
उदाहरण –
उपकृष्णम् = कृष्णस्य समीपम् (कृष्ण के समीप)
यथाशक्ति = शक्तिम् अनतिक्रम्य (शक्ति के अनुसार)
प्रतिदिनम् = दिनं दिनम् अथवा दिनं दिनं प्रति (हर दिन)
Avyayibhava Samas (Adverbial Compound): In this compound, the first word (Purva-pada) is an indeclinable word (Avyaya or prefix) and holds the primary importance in the compound. After the compounding process, the entire word functions as an adverb and is typically used in the neuter gender singular form. Common prefixes used here include Upa (near), Yatha (according to), and Prati (every). For example, Yathashakti means “according to one’s capability or strength”.
2. तत्पुरुष समास (Tatpurusha Samas (tatpuruṣa)
तत्पुरुष समास में दूसरा पद (उत्तर पद) प्रधान होता है। इसमें पूर्व पद की विभक्ति का लोप हो जाता है। संस्कृत समासों में यह सबसे बड़ा समास है। इसके कई भेद होते हैं। यहाँ सिर्फ उन्हीं भेदों का उल्लेख किया जाएगा, जो सीबीएसई CBSE कक्षा 9 एवं 10 के पाठ्यक्रम में हैं। इसके व्यधिकरण भेद को ‘विभक्ति तत्पुरुष’ भी कहते हैं। इसके द्वितीया से लेकर सप्तमी तक छः भेद होते हैं। इसके अतिरिक्त तत्पुरुष के दो और भेद होते हैं- नञ तत्पुरुष एवं उपपद तत्पुरुष।
विभक्ति तत्पुरुष
समस्त पद के दोनों पद अलग-अलग विभक्तियों में होते हैं। पूर्व पद की विभक्ति के नाम पर समास का नाम होता है।
द्वितीया तत्पुरुष
पूर्व पद (प्रथम पद) से द्वितीया विभक्ति का लोप होता है। उदाहरण के लिए = सुखं प्राप्तः = सुखप्राप्तः (सुख को प्राप्त) यहाँ प्रथम पद “सुखं” से द्वितीया विभक्ति का लोप करके उसे दूसरे पद से जोड़कर समास बनाया गया है।
तृतीया तत्पुरुष
प्रस्तुत समास में प्रथम पद से तृतीया विभक्ति का लोप होता है। उदाहरण =बाणेन हतः = बाणहतः (बाण से मारा हुआ)
चतुर्थी तत्पुरुष
इसमें प्रथम पद तृतीया में होता है और उसका लोप करके समस्त पद बनाया जाता है। उदाहरण = भूताय बलिः = भूतबलिः (भूत के लिए बलि)
पञ्चमी तत्पुरुष
इस भेद में पूर्व पद पञ्चमी विभक्ति में होता है। उदाहरण के लिए = चोरात् भयम् = चोरभयम् (चोर से डर)
षष्ठी तत्पुरुष
तत्पुरुष के इस भेद में पूर्व पद षष्ठी विभक्ति में होता है। यह संस्कृत पाठों में सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाला संस्कृत समास है। उदाहरण = देवस्य पूजकः = देवपूजकः (देव का पूजक)
सप्तमी तत्पुरुष
सप्तमी तत्पुरुष समास में प्रथम (पूर्व) पद सप्तमी में होता है। कार्ये कुशलः = कार्यकुशलः (कार्य में कुशल)
Tatpurusha Samas (Determinative Compound): In a Tatpurusha compound, the second word (Uttara-pada) carries the main meaning and importance. When the compound is formed, the case-ending (Vibhakti) of the first word is dropped. This compound is divided into various categories based on the case-endings from the second case (Dvitiya) to the seventh case (Saptami). For example, Chorabhayam is formed by combining Chorat (from the thief – 5th case) and Bhayam (fear), translating directly to “fear of a thief”.
तत्पुरुष समास के विशेष उपभेद (Special Sub-types of Tatpurusha)
कक्षा 9 के नए पाठ्यक्रम (जैसे ‘शारदा’ पाठ्यपुस्तक) के अनुसार, तत्पुरुष समास के अंतर्गत विभक्ति तत्पुरुष के अलावा दो और बेहद महत्वपूर्ण उपभेद शामिल किए गए हैं:
नञ्-तत्पुरुष समास (Nañ Tatpurusha Samas)
जब तत्पुरुष समास का पहला पद कोई निषेध (नकारात्मक या ‘नहीं’ का भाव) बताने वाला शब्द हो, तो उसे नञ्-तत्पुरुष समास कहते हैं। इसका विग्रह करते समय पहले पद के स्थान पर केवल ‘न’ लिखा जाता है।
समस्त पद बनाने का आसान नियम:
– उत्तर पद (दूसरा शब्द) किसी व्यंजन (Consonant) से शुरू हो रहा है, तो ‘न’ बदलकर ‘अ’ हो जाता है। (जैसे: न + धर्मः = अधर्मः)
– दूसरा पद (उत्तर पद) किसी स्वर (Vowel) से शुरू हो रहा है, तो ‘न’ बदलकर ‘अन्’ हो जाता है। (जैसे: न + उचितम् = अनुचितम्)
उदाहरण
न + सुखम् = असुखम् (जो सुख न हो)
न + सत्यम् = असत्यम् (जो सत्य न हो)
न + इच्छा = अनिच्छा (इच्छा न होना – स्वर से शुरू)
न + आदरः = अनादरः (आदर न होना – स्वर से शुरू)
Nañ Tatpurusha Samas (Negative Determinative Compound): This sub-type of Tatpurusha is used to express negation, absence, or the opposite of something. When dissolving the compound (Vigrah), the particle ‘Na’ (meaning ‘not’) is placed before the second word. There is a simple grammatical rule for combining them: if the second word begins with a consonant, ‘Na’ transforms into the prefix ‘A-‘ (e.g., Na + Dharmah = Adharmah). However, if the second word begins with a vowel, ‘Na’ changes into ‘An-‘ to maintain phonetic harmony (e.g., Na + Ichha = Anichha).
उपपद-तत्पुरुष समास (Upapada Tatpurusha Samas)
इस समास की सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसका दूसरा पद (उत्तर पद) स्वतंत्र रूप से एक पूरा शब्द नहीं होता, बल्कि वह कोई क्रियावाचक धातु रूप या प्रत्यय (जैसे- कार, ज, द, ग) होता है। जब तक वह पहले पद के साथ नहीं जुड़ता, उसका अकेले कोई स्वतंत्र प्रयोग नहीं हो सकता। इसका विग्रह करते समय अंत में ‘इति’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।
मुख्य पहचान शब्द
कारः = करने वाला (करोति इति)
जः = जन्म लेने वाला (जायते इति)
दः = देने वाला (ददाति इति)
उदाहरण
कुम्भं करोति इति = कुम्भकारः (घड़ा बनाने वाला / कुम्हार)
पङ्के (कीचड़ में) जायते इति = पङ्कजम् (कमल)
जले जायते इति = जलजः (कमल)
जलं ददाति इति = जलदः (बादल)
धनं ददाति इति = धनदः (कुबेर / धन देने वाला)
Upapada Tatpurusha Samas (Dependent Particle Compound): In an Upapada compound, the second component (Uttara-pada) cannot stand alone as an independent word in a sentence; it is always a verbal root or derivative (like -karah for doer, -jah for born, or -dah for giver). It attains a complete meaning only when appended to a preceding noun (Upapada). When dissolving this compound, the phrase ends with ‘Iti’ to denote the action. For example, Kumbham karoti iti becomes Kumbhakarah (potter / one who makes pots), where -karah dynamically roots back to the action of making.
3. कर्मधारय समास (Karmadharaya Samas (karmadhāraya )
यह तत्पुरुष समास का ही एक उपभेद है, लेकिन यहाँ हम इसे उससे अलग मानकर चलते हैं। इसमें एक पद विशेषण (विशेषता बताने वाला) और दूसरा पद विशेष्य (जिसकी विशेषता बताई जाए) होता है। अथवा इसमें उपमान (जिससे तुलना हो) और उपमेय (जिसकी तुलना हो) का संबंध होता है।
उदाहरण
महान् च असौ देवः = महादेवः (महान है जो देव)
नीलम् उत्पलम् = नीलोत्पलम् (नीला कमल)
घन इव श्यामः = घनश्यामः (बादल के समान काला)
Karmadharaya Samas (Appositional/Descriptive Compound): Karmadharaya is considered a sub-type of the Tatpurusha compound. In this type, the relation between the two words is that of an adjective (Visheshana) and a noun (Visheshya), or a metaphor/comparison (Upamana and Upameya). Both words generally point to the same object. An example is Mahadevah, which means “the great god” (Mahan = great, Devah = god), where ‘great’ describes ‘god’.
4. द्विगु समास (Dvigu Samas)
यह समास सबसे आसान माना जाता है। जिस समास का पहला पद कोई संख्यावाची (नंबर बताने वाला) शब्द हो और वह पूरे समूह (समाहार) का बोध कराए, उसे द्विगु समास कहते हैं।
उदाहरण
त्रयाणां भुवनानां समाहारः = त्रिभुवनम् (तीन भुवनों का समूह)
पञ्चानां वटानां समाहारः = पञ्चवटी (पाँच वटों का समूह)
शतानां अब्दानां समाहारः = शताब्दी (सौ वर्षों का समूह)
Dvigu Samas (Numeral Compound): This is one of the easiest compounds to identify. If the first word of the compound is a numeral (Sankhya) and the whole compound represents a collection or a group (Samahara), it is called a Dvigu Samas. For instance, Tribhuvanam is a collection of three worlds (Tri = three, Bhuvanam = worlds), and Panchavati refers to a group of five banyan trees.
5. द्वंद्व समास (Dvandva Samas)
इस समास में दोनों ही पद (पूर्व पद और उत्तर पद) समान रूप से प्रधान होते हैं। विग्रह करते समय इनके बीच में ‘च’ (और) का प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण:
रामः च लक्ष्मणः च = रामलक्ष्मणौ (राम और लक्ष्मण)
माता च पिता च = मातरपितरौ या मातापितरौ (माता और पिता)
पत्रं च पुष्पं च फलं च = पत्रपुष्पफलानि (पत्ता, फूल और फल)
Dvandva Samas (Copulative Compound): In a Dvandva compound, both the constituent words hold equal importance and status. When you dissolve or translate this compound, the words are linked by the conjunction ‘and’ (represented by Cha in Sanskrit). A classic example is Ramalaksmanau, which means “Rama and Laksmana”. Depending on whether the items form a pair or a collective group, the final word takes a dual or plural ending.
द्वंद्व समास के मुख्य भेद (Types of Dvandva Samas)
कक्षा 9 और 10 के पाठ्यक्रम के अनुसार, द्वंद्व समास के मुख्य रूप से दो सबसे महत्वपूर्ण भेद होते हैं, जिन्हें समझना बेहद जरूरी है
इतरेतर द्वंद्व समास (Itaretara Dvandva Samas)
इस समास में जुड़े हुए दोनों या सभी पदों का अपना अलग-अलग और स्वतंत्र अस्तित्व होता है। जब इनका समस्त पद (सामासिक शब्द) बनाया जाता है, तो अंतिम शब्द का वचन इस बात पर निर्भर करता है कि समास में कुल कितने पद हैं। यदि दो पद हैं तो द्विवचन और दो से अधिक पद हैं तो बहुवचन का प्रयोग होता है। लिंग हमेशा अंतिम पद के अनुसार होता है।
उदाहरण
माता च पिता च = मातापितरौ (यहाँ दो पद हैं, इसलिए ‘पितृ’ शब्द का द्विवचन ‘पितरौ’ हुआ)
रामः च लक्ष्मणः च = रामलक्ष्मणौ (दो पद होने के कारण द्विवचन)
पत्रं च पुष्पं च फलं च = पत्रपुष्पफलानि (यहाँ तीन पद हैं, इसलिए अंतिम शब्द ‘फल’ का बहुवचन ‘फलानि’ हुआ)
Itaretara Dvandva Samas (Individualistic Copulative): In this sub-type, every individual word in the compound retains its distinct, independent existence and meaning. When these words are combined, the final grammatical number (Vachana) of the compound depends on the total count of the items being linked. If there are two items, the final word takes the dual form (Dvivachana). If there are three or more items, it takes the plural form (Bahuvachana). The overall gender of the compound is governed by the very last word. For example, combining Ramah and Laksmanah results in Ramalaksmanau (dual ending), meaning both individuals are counted separately.
समाहार द्वंद्व समास (Samahara Dvandva Samas)
इस समास में आए हुए पद अपना अलग-अलग अस्तित्व दिखाने के बजाय एक ‘समूह’ या ‘समाहार’ (Collection/Group) का बोध कराते हैं। इस समास की सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसका समस्त पद हमेशा नपुंसकलिंग एकवचन (Neuter Gender Singular) में ही रहता है, चाहे उसमें कितने भी पद क्यों न जुड़े हों। आमतौर पर अंगों के नाम, जन्मजात शत्रुता वाले जीवों के नाम या सेना के अंगों के लिए इसका प्रयोग होता है।
उदाहरण
पाणि (हाथ) च पादौ (पैर) च एषां समाहारः = पाणिपादम् (हाथ और पैरों का समूह)
अहः (दिन) च रात्रिः च अनयोः समाहारः = अहोरात्रम् (दिन और रात का समूह)
यूका च लिक्षा च एषां समाहारः = यूकालिक्षम् (जूँ और लीख का समूह)
Samahara Dvandva Samas (Collective Copulative): In a Samahara compound, the constituent words do not stand out as individual entities; instead, they combine to represent an aggregate collection or a unified group (Samahara). A defining rule of this sub-type is that the final compound word is always expressed in the neuter gender singular form, regardless of how many items are being combined. It is commonly used for body parts, natural enemies in the animal kingdom, or components of an army. For instance, combining Paani (hands) and Paadau (feet) creates Paanipaadam, which denotes the single collective concept of “hands and feet together”.
6. बहुव्रीहि समास (Bahuvrihi Samas (bahuvrīhi)
इस समास में न तो पहला पद प्रधान होता है और न ही दूसरा पद। बल्कि दोनों पद मिलकर किसी तीसरे अन्य पद (किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु) की ओर इशारा करते हैं और वह तीसरा पद ही प्रधान होता है
उदाहरण
पीतम् अम्बरं यस्य सः = पीताम्बरः (पीले हैं वस्त्र जिसके अर्थात – भगवान कृष्ण/विष्णु)
दश आननानि यस्य सः = दशाननः (दस हैं मुख जिसके अर्थात – रावण)
लम्बं उदरं यस्य सः = लम्बोदरः (लम्बा है पेट जिनका अर्थात – गणेश जी)
Bahuvrihi Samas (Attributive/Exocentric Compound): In a Bahuvrihi compound, neither the first word nor the second word retains its primary meaning. Instead, the two words together act as an adjective to describe a third, external entity (Anyapada). This third entity becomes the main focus of the compound. For example, Dashananah literally combines Dasha (ten) and Anana (faces), but it doesn’t just mean ten faces; it refers specifically to the entity who has ten faces, which is “Ravana”.
संस्कृत समास भेद की तालिका
| समास / उपभेद (Samas & Types) | मुख्य नियम (Key Rules) | उदाहरण (Example) |
|---|---|---|
| अव्ययीभाव समास Avyayibhava Samas | पहला पद अव्यय/उपसर्ग होता है और वही प्रधान होता है। समस्त पद हमेशा नपुंसकलिंग एकवचन में रहता है (कक्षा 10 हेतु मुख्य)। | यथाशक्ति विग्रह: शक्तिं अनतिक्रम्य |
| तत्पुरुष समास Tatpurusha Samas | उत्तर पद (दूसरा पद) प्रधान होता है। इसके अंतर्गत विभक्ति, नञ् और उपपद भेद शामिल हैं (कक्षा 9 व 10 दोनों हेतु महत्वपूर्ण)। | राजपुरुषः विग्रह: राज्ञः पुरुषः |
| 1. द्वितीया-तत्पुरुष (Dvitiya Tatpurusha) | पूर्व पद में द्वितीया विभक्ति (‘को’ का अर्थ) का लोप होता है। ‘श्रित, अतीत, प्राप्त’ आदि शब्द उत्तर पद में आते हैं। | सुखप्राप्तः विग्रह: सुखं प्राप्तः |
| 2. तृतीया-तत्पुरुष (Tritiya Tatpurusha) | पूर्व पद में तृतीया विभक्ति (‘से / के द्वारा’ का अर्थ) का लोप होता है। ‘हीन, युक्त, सदृश’ शब्द यहाँ आते हैं। | बाणहतः विग्रह: बाणेन हतः |
| 3. चतुर्थी-तत्पुरुष (Chaturthi Tatpurusha) | पूर्व पद में चतुर्थी विभक्ति (‘के लिए’ का अर्थ) का लोप होता है। ‘बलि, हित, सुख, रक्षित’ शब्द मुख्य रूप से आते हैं। | भूतबलिः विग्रह: भूताय बलिः |
| 4. पंचमी-तत्पुरुष (Panchami Tatpurusha) | पूर्व पद में पंचमी विभक्ति (‘से अलग होने / डर’ का अर्थ) का लोप होता है। ‘भय, भीत, मुक्त, पतित’ शब्द आते हैं। | चोरभयम् विग्रह: चोरात भयम् |
| 5. षष्ठी-तत्पुरुष (Shasthi Tatpurusha) | पूर्व पद में षष्ठी विभक्ति (‘का, के, की’ संबंध का अर्थ) का लोप होता है। यह सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला भेद है। | देवपूजकः विग्रह: देवस्य पूजकः |
| 6. सप्तमी-तत्पुरुष (Saptami Tatpurusha) | पूर्व पद में सप्तमी विभक्ति (‘में, पर’ का अर्थ) का लोप होता है। ‘कुशल, निपुण, प्रवीन’ आदि शब्द आते हैं। | कार्यकुशलः विग्रह: कार्ये कुशलः |
| 7. नञ्-तत्पुरुष समास (Nañ Tatpurusha) | पूर्व पद में निषेध या नकारात्मक (न) शब्द होता है। विग्रह का ‘न’ समस्त पद बनते समय व्यंजन के आगे ‘अ’ और स्वर के आगे ‘अन्’ हो जाता है। | अनुचितम् / अधर्मः विग्रह: न उचितम् / न धर्मः |
| 8. उपपद-तत्पुरुष समास (Upapada Tatpurusha) | जहाँ दूसरा पद (उत्तर पद) कोई स्वतंत्र शब्द न होकर एक क्रियावाचक प्रत्यय या धातु रूप (जैसे- कार, ज, द) होता है। | कुम्भकारः / जलदः विग्रह: कुम्भं करोति इति / जलं ददाति इति |
| कर्मधारय समास Karmadharaya Samas | पहला पद विशेषण (या उपमान) और दूसरा पद विशेष्य (या उपमेय) होता है। दोनों में समान विभक्ति होती है (कक्षा 9 हेतु मुख्य)। | महापुरुषः विग्रह: महान् च असौ पुरुषः |
| द्विगु समास Dvigu Samas | पूर्व पद संख्यावाची (नंबर) होता है और समस्त पद किसी समूह या समाहार का बोध कराता है। | त्रिभुवनम् विग्रह: त्रयाणां भुवनानां समाहारः |
| इतरेतर द्वंद्व समास Itaretara Dvandva | दोनों पदों की प्रधानता और अलग अस्तित्व होता है। विग्रह में ‘च’ लगता है। पद संख्या अनुसार द्विवचन/बहुवचन होता है। | रामलक्ष्मणौ विग्रह: रामः च लक्ष्मणः च |
| समाहार द्वंद्व समास Samahara Dvandva | पदों का अपना अलग अस्तित्व न होकर एक समूह का बोध होता है। समस्त पद हमेशा नपुंसकलिंग एकवचन में होता है। | पाणिपादम् विग्रह: पाणि च पादौ च एषां समाहारः |
| बहुव्रीहि समास Bahuvrihi Samas | कोई भी पद प्रधान नहीं होता, बल्कि दोनों पद मिलकर किसी तीसरे अन्य पद (व्यक्ति/वस्तु) की विशेषता बताते हैं (कक्षा 10 हेतु मुख्य)। | लम्बोदरः विग्रह: लम्बं उदरं यस्य सः |
परीक्षा के लिए कुछ महत्वपूर्ण टिप्स (Exam Tips for Class 9 & 10)
परीक्षा में संस्कृत समास सम्बन्धी प्रश्नों को हल करते समय कुछ टिप्स का ध्यान रखेंगे, तो अंक अच्छे आएंगे। उनमें से कुछ टिप्स यहाँ दिए गए हैं।
विभक्ति का ज्ञान: तत्पुरुष समास को सही करने के लिए आपको शब्दरूप और उनकी विभक्तियों का ज्ञान होना बहुत जरूरी है।
‘च’ और संख्या पर ध्यान दें: अगर शब्द में संख्या दिखे तो पहले द्विगु के बारे में सोचें, और यदि विग्रह में ‘च’ लगाना हो तो वह द्वंद्व होगा।
पहला पद अव्यय: यदि शुरुआत में यथा, उप, प्रति, सम् जैसे शब्द दिखें, तो बिना देर किए उसे अव्ययीभाव समास पहचानें।
To score well in your board exams, focus closely on memorizing case-endings (Vibhaktis), as they are crucial for solving Tatpurusha compounds. Look out for quick triggers: if the word starts with a number, check for Dvigu; if it starts with an unchangeable prefix like Yatha or Prati, it is Avyayibhava. Practicing the dissolution (Vigrah) of standard textbook examples will give you an edge in the examinations.
शेमुषी (भाग 1 एवं 2)पर आधारित परीक्षा में पूछे गए संस्कृत समास सम्बन्धी महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Applied Grammar MCQs)
बोर्ड परीक्षा में समास सीधे परिभाषा के रूप में नहीं, बल्कि आपकी पाठ्यपुस्तक के वाक्यों में से रेखांकित पदों के रूप में पूछे जाते हैं। नीचे पिछले वर्षों के बोर्ड एग्जाम्स (Previous Years Questions) में आए 10 महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें:
निर्देश: अधोलिखितवाक्येषु रेखाङ्कितपदानां समास / समासविग्रहं वा विकल्पेभ्यः चिनुत—
(नीचे लिखे वाक्यों में रेखांकित पदों का समास या समास-विग्रह दिए गए विकल्पों में से चुनिए—
प्रश्न 1. महानगरेषु महानगरमध्ये चलदर्निशं कालायसचक्रम्। (पाठ – शुचिपर्यावरणम्)
(A) महानगरस्य मध्ये
(B) महानगराणाम् मध्ये
(C) महानगरे मध्ये
(D) महानगरात् मध्ये
सही उत्तर: (B) महानगराणाम् मध्ये
व्याख्या यह षष्ठी-तत्पुरुष समास का उदाहरण है। ‘महानगरों के बीच में’ अर्थ होने के कारण ‘महानगर’ शब्द का बहुवचन षष्ठी रूप ‘महानगराणाम्’ और उत्तर पद ‘मध्ये’ मिलकर विग्रह बनता है।
प्रश्न 2. अत्र जीवितं दुर्वहम् जातं प्रकृतिरेव शरणम्। (पाठ – शुचिपर्यावरणम्)
(A) वहस्य पश्चात्
(B) वहं वहं प्रति
(C) वहस्य अभावः
(D) वहस्य काठिन्यम् (कष्टेन वहम्)
सही उत्तर: (D) वहस्य काठिन्यम् (कष्टेन वहम् / दुःशकेन वहम्)
व्याख्या: ‘दुर्वहम्’ में ‘दुर्’ उपसर्ग का प्रयोग ‘कठिन’ या ‘कष्ट’ के अर्थ में हुआ है, जो कि एक अव्ययीभाव समास है। इसका सही विग्रह ‘वहस्य काठिन्यम्’ या ‘कष्टेन वहम्’ होता है।
प्रश्न 3.व्याघ्रः व्याघ्रमारी इयमिति मत्वा पलायितः। (पाठ – बुद्धिर्बलवती सदा)
(A) व्याघ्राय मारयति यस्याः सा
(B) व्याघ्रस्य इव मारी यस्याः सा
(C) व्याघ्रे बुद्धिः यस्याः सा
(D) व्याघ्रं मारयति या सा
उत्तर: (D) व्याघ्रं मारयति या सा
व्याख्या: यह बहुव्रीहि समास है। वाक्य के संदर्भ में ‘व्याघ्रं मारयति या सा ‘ का अर्थ है—”बाघ को मारती है जो स्त्री “। जहाँ अन्य पद (स्त्री) की प्रधानता है।
प्रश्न 4. तौ कुशलवौ मातुरपमानं सोढुं न शक्नुतः। (पाठ – शिशुलालनम्)
(A) कुशः च लवः च
(B) कुशा च लवा च
(C) कुशः च लवौ च
(D) कुशलः च लवः च
सही उत्तर: (A) कुशः च लवः च
व्याख्या: यह इतरेतर द्वंद्व समास का प्रमुख उदाहरण है। ‘कुश और लव’ दो व्यक्ति हैं, इसलिए समस्त पद में द्विवचन का प्रयोग होकर ‘कुशलवौ’ बनता है और विग्रह में दोनों के साथ ‘च’ जुड़ता है।
प्रश्न 5. उद्यानम् पक्षिणां कलरवम् चेतः प्रसादयति। (पाठ – शुचिपर्यावरणम्)
(A) पक्षिक कलरवम्
B) पक्षिक कलरवः
(C) पक्षिकलरवम्
(D) पक्षिणाम् कलरवम्
सही उत्तर: (C) पक्षिकलरवम्
व्याख्या: ‘पक्षिणां कलरवम्’ (पक्षियों की चहचहाहट) का जब समस्त पद बनाया जाता है, तो पूर्व पद की षष्ठी विभक्ति का लोप हो जाता है और मूल शब्द ‘पक्षिन्’ का ‘पक्षिका/पक्षि’ रूप जुड़कर ‘पक्षिकलरवम्’ बनता है।
प्रश्न 6. वाल्मीकिः लवकुशयोः उपनयनोपदेशेन गुरुः आसीत्। (पाठ – शिशुलालनम्)
(A) उपनयनाय उपदेशेन
(B) उपनयनस्य उपदेशेन
(C) उपनयने उपदेशेन
(D) उपनयनात् उपदेशेन
सही उत्तर: (B) उपनयनस्य उपदेशेन
व्याख्या: यह षष्ठी-तत्पुरुष समास का उदाहरण है। ‘उपनयन (जनेऊ संस्कार) के उपदेश के कारण’, इसमें ‘के’ संबंध कारक होने से ‘उपनयनस्य’ विग्रह पद सही है।
प्रश्न 7. प्रश्न: सिंहः सक्रोधम् गर्जति।
(A) क्रोधेन सहितम्
(B) क्रोधस्य पश्चात्
(C) क्रोधं प्रति
(D) क्रोधस्य अभावः
उत्तर: (A) क्रोधेन सहितम्
व्याख्या: ‘सक्रोधम्’ एक अव्ययीभाव समास है। यहाँ ‘स’ (सहित) अव्यय का प्रयोग होने के कारण तृतीया विभक्ति के साथ ‘सहितम्’ लिखा जाता है।
प्रश्न 8 सः महात्मा व्याकुलचित्तः जातः। (पाठ – विचित्रः साक्षी)
(A) व्याकुलं चित्तं यस्य सः
(B) व्याकुलस्य चित्तम्
(C) व्याकुले चित्तम्
(D) व्याकुलं च चित्तं च
उत्तर: (A) व्याकुलं चित्तं यस्य सः
व्याख्या: यह बहुव्रीहि समास है। वाक्य में ‘व्याकुलचित्तः’ विशेषण के रूप में उस ‘महात्मा’ या ‘अतिथि’ के लिए प्रयुक्त हुआ है जिसका चित्त (मन) व्याकुल हो गया है।
प्रश्न 9. रामः सबाष्पम् अवलोकयति। (पाठ – शिशुलालनम्)
(A) बाष्पस्य समीपम्
(B) बाष्पेण सहितम्
(C) बाष्पस्य योग्यम्
(D) बाष्पम् बाष्पम् प्रति
उत्तर: (B) बाष्पेण सहितम्
व्याख्या: अव्ययीभाव समास के नियमानुसार जब ‘स’ उपसर्ग सहित (साथ) के अर्थ में आता है, तो पूर्व पद में तृतीया विभक्ति (बाष्पेण) लगकर ‘सहितम्’ जुड़ता है। इसका अर्थ है ‘आँसुओं के साथ’।
प्रश्न 10 तत्र जीमूतकेतुः नाम विद्याधरपतिः वसति स्म। (कक्षा 9, पाठ – कल्पतरुः)
(A) विद्याधराणाम् पतिः
(B) विद्याधरे पतिः
(C) विद्याधराय पतिः
(D) विद्याधरात् पतिः
सही उत्तर: (A) विद्याधराणाम् पतिः
व्याख्या: यह षष्ठी-तत्पुरुष समास का उदाहरण है। ‘विद्याधरों का स्वामी (पति)’ होने के कारण पूर्व पद में बहुवचन षष्ठी विभक्ति (विद्याधराणाम्) का प्रयोग किया गया है।
नई पाठ्यपुस्तक ‘शारदा’ (Class 9) पर आधारित संस्कृत समास सम्बन्धी अनुप्रयुक्त व्याकरण के प्रश्न MCQs
नई एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक ‘शारदा’ के विभिन्न पाठों के वाक्यों से चुने गए नीचे दिए गए समास और समास-विग्रह के प्रश्नों का अभ्यास करें। यह आपकी परीक्षा के नए पैटर्न के अनुसार हैं।
निर्देश: ‘शारदा’ पाठ्यपुस्तकानुसारं रेखाङ्कितपदानां समास / समासविग्रहं वा विकल्पेभ्यः चिनुत—
(शारदा पाठ्यपुस्तक के अनुसार रेखांकित (Bold)पदों का समास या समास-विग्रह दिए गए विकल्पों में से चुनिए—)
1. शब्दसाहित्यलीलावनं संस्कृतम्
(A) लीला च वनं च
(B) लीला च तत् वनं
(C) लीलायाः वनम्
(D) लीलानां वनम्
उत्तर– लीलायाः वनम्
व्याख्या- यहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास है। इसलिए उत्तर लीलायाः वनम् होगा। इसका अर्थ है की संस्कृत शब्द और साहित्य की लीला का वन है।
2. धर्मस्य मूलम् अर्थः इति नीतिः कथयति। (द्वितीयः पाठः – सुखस्य मूलं धर्मः…
(A) धर्ममूलम्
(B) धर्मेमूलम्
(C) धर्मान्मूलम्
(D) धर्मम्मूलम्
उत्तर: (A) धर्ममूलम
व्याख्या: यह षष्ठी-तत्पुरुष समास का उदाहरण है। ‘धर्म का मूल’ अर्थ होने के कारण पूर्व पद की षष्ठी विभक्ति ‘स्य’ का लोप हो जाता है और मूल शब्द जुड़कर ‘धर्ममूलम्’ बनता है।
3. यः मानवः आत्मवत् सर्वभूतेषु पश्यति, सः एव पण्डितः। (तृतीयः पाठः – आत्मवत् सर्वभूतेषु…)
(A) आत्मनः वत्
(B) आत्मन: सदृशम्
(C) आत्मानं प्रति
(D) आत्मनि इव
उत्तर: (B) आत्मन: सदृशम् (या आत्मनि इव / आत्मनः सदृशम्)
व्याख्या: पाठ के संदर्भ में ‘आत्मवत्’ एक अव्यय पद की तरह व्यवहार करता है जिसका अर्थ है ‘अपने समान’ या ‘अपने जैसा’। इसका सही विग्रह ‘आत्मन: सदृशम्’ (अपने जैसा) होता है।
4. सः विद्वान् क्रोधेन सहितम् वचनम् अवदत्। (पञ्चमः पाठः – एषा बुद्धिमताम् बुद्धिः…)
(A) अक्रोधम्
(B) प्रतिक्रोधम्
(C) सक्रोधम्
(D) क्रोधयुक्तम्
उत्तर: (C) सक्रोधम्
व्याख्या: यह अव्ययीभाव समास है। जब ‘स’ उपसर्ग ‘सहित’ (साथ) के अर्थ में प्रयोग होता है, तो समस्त पद के प्रारंभ में ‘स’ जुड़ता है और अंत में नपुंसकलिंग एकवचन रूप ‘सक्रोधम्’ बनता है।
5. बुद्धिमान् जनः सदा मनसा पूतम् समाचरेत्। (षष्ठः पाठः – मनःपूतं समाचरेत्)
(A) मनपूतम्
(B) मनःपूतम्
(C) मनसिपूतम्
(D) मनापूतम्
उत्तर: (B) मनःपूतम्
व्याख्या: यह तृतीया-तत्पुरुष समास का उदाहरण है। ‘मन से पवित्र (किया हुआ)’, यहाँ समस्त पद बनते समय विभक्ति का लोप होकर मूल शब्द ‘मनस्’ और ‘पूत’ मिलकर विसर्ग संधि के नियम से ‘मनःपूतम्’ बनते हैं।
अन्ततः
संक्षेप में, संस्कृत व्याकरण में ‘समास’ को रटने के बजाय यदि आप इसके नियमों और विग्रह करने के तरीके को समझ लें, तो परीक्षा में पूरे अंक पाना बेहद आसान हो जाता है। चाहे आपके स्कूल में नई पाठ्यपुस्तक ‘शारदा’ पढ़ाई जा रही हो या फिर ‘शेमुषी’, परीक्षा का मूल मंत्र यही है कि आप वाक्यों के संदर्भ (Context) को समझें और निरंतर अभ्यास करें। हमें उम्मीद है कि इस पोस्ट से आपको समास के भेदों और उनके अनुप्रयुक्त व्याकरण (Applied Grammar) को समझने में मदद मिली होगी।
अब आपकी बारी है! नीचे कमेंट बॉक्स में हमें बताएं कि आपको कौन सा समास सबसे आसान लगता है और यदि आपका कोई सवाल है, तो उसे भी ज़रूर लिखें। आपकी बोर्ड परीक्षाओं के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
In conclusion, mastering ‘Samas’ in Sanskrit grammar does not require rote memorization. Instead, it demands a clear understanding of its core rules and the process of dissolution (Vigrah). Whether your curriculum follows the new textbook ‘Sharda’ or the ongoing ‘Shemushi’, the ultimate key to scoring perfect marks in your board exams is analyzing the words within the context of the sentence and practicing applied grammar regularly. We hope this comprehensive guide has simplified the concepts and types of compounds for you.
Now, it’s your turn! Let us know in the comments below which Samas you find the easiest to identify, and feel free to drop any questions you might have. Wishing you all the very best for your upcoming exams!
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